आज इस महान पक्षी की दशा ये है कि ये विलुप्त होने के कगार पर खड़ा हैं

एक समय था जब हम छोटे होते थे और आसमान की ओर देखने पर कुछ ऐसे पक्षी दिखाई देते थे जिनका आकार सामान्य पक्षियों से कई गुना बड़ा होता था। वे अक्सर बादलों से भी ऊँचा उड़ते दिखाई देते थे। यहाँ बात हो रही है उन विशाल गिद्धों की जो कभी भारत में अपने इलाकों में बड़ी शान से घूमते दिखाई देते थे पर आज इस महान पक्षी की दशा ये है कि ये विलुप्त होने के कगार पर खड़ा हैं।

आखिर इन पक्षियों का हमारे जीवन में क्या महत्व हैं और ऐसा क्या हुआ जो आज इस पक्षी की हालत दयनीय हैं?

पढ़िए ये ख़ास रिपोर्ट

गिद्घ : पर्यावरण के प्राकृतिक सफाईकर्मी

गिद्ध मृत और सड़ रहे पशुओं के शवों को भोजन के तौर पर खाते हैं और इस प्रकार मिट्टी में खनिजों की वापसी की प्रक्रिया को बढ़ाते है। इसके अलावा, मृत शवों को समाप्त कर वे संक्रामक बीमारियों को फैलने से भी रोकते हैं। गिद्धों की अनुपस्थिति में मूषक और आवारा कुत्तों जैसे पशुओं द्वारा रेबीज जैसी बीमारी के प्रसार को बढ़ाने की संभावना बढ़ जाएगी।

वास्तविक हालात :

80 के दशक के आसपास देश में, एक अनुमान के अनुसार, करीब 80 लाख गिद्ध थे पर 1993-2003 तक इनकी संख्या में 96% गिरावट देखी गयी जो साल 2008 में 99.9% तक पहुंच गई। किसी को भी इनकी इस गिरती संख्या का कारण समझ में नही आ रहा था।

एक वजह थी डाइक्लोफेनाक (Diclofenac)

ये दवा जानवरों को बुख़ार आदि होने पर दी जाने वाली सामान्य दवा थी; जिसका इस्तेमाल भी बहुत आम था। एक स्टडी के अनुसार अगर ये दवा 1% जानवरों के अवषेशों में भी पाई जाए तो यह भारत के 60-90% गिद्धों की मौत का प्रमुख कारण बन सकती है जो अपने जीवन के लिए पूर्ण रूप से इन अवशेषों पर निर्भर रहते है।

आंकड़ो के अनुसार 10% अवशेषों इस दवा से दूषित पाए गए। ऐसे हालातों में भारत मे आज भी कुछ गिद्धों का दिखना किसी चमत्कार से कम नही है।

गिद्ध पर डिक्लोफेनाक का प्रभाव :
डिक्लोफेनाक का बड़े पैमाने पर प्रयोग भारत में गिद्धों की मौत

गिद्ध पर डिक्लोफेनाक का प्रभाव : डिक्लोफेनाक का बड़े पैमाने पर प्रयोग भारत में गिद्धों की मौत की वजह है। चूंकि गुर्दों को इस दवा को शरीर से बाहर करने में काफी समय लग जाता है इसलिए मृत्यु के बाद भी यह पशु के शरीर में मौजूद रहता है। चूंकि गिद्ध मुर्दाखोर होते हैं और इसलिए वे मृत पशुओं के शवों को भोजन के तौर पर ग्रहण करने लगते हैं। एक बार जब वे डिक्लोफेनाक संदूषित मांस का सेवन कर लेते हैं तो उनके गुर्दे काम करना बंद कर देते हैं और उनकी मौत हो जाती है।

भारत सरकार द्वारा इस दवा के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाना निश्चित तौर पर एक सराहनीय कदम है।

DDT : डाइक्लोरो डाइफिनाइल ट्राईक्लोरोइथेन

यह एक प्रकार का कीटनाशक है जो गिद्धों के शरीर में खाद्य श्रृंखला के माध्यम से प्रवेश करता है जहां यह एस्ट्रोजन हार्मोन की गतिविधि को प्रभावित करता है, परिणामस्वरूप गिद्धों की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करता है, जो इनकी संख्या के कम होने के कई कारणों में से एक है।

क्या गिद्ध विलुप्त हो चुके है

ऐसा नहीं है। भारतीय सरकार ने पिछले 15 सालो में इस और ध्यान देकर इन्हे लुप्त होने से तो बचा लिए लेकिन कुछ शारारिक बदलाव आसानी से देखें जा सकते है। जैसे पहले गिद्ध आकार में बड़े होते थे लेकिन आज ऐसा नहीं है। ये आकार में पहले के मुक़ाबले काफी छोटे हो गए है। हम यही कामना करते है इनकी प्रजाति जल्द ही वापस लौटेगी और आसमान में फिर से ऊँचा उड़ेगी। अब गिद्धों की संख्या कुछ हज़ारों में ही है।

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